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अपनी जन्म तिथि, समय और स्थान डालकर तुरंत अपनी संपूर्ण जन्म कुंडली प्राप्त करें। लग्न कुंडली, चंद्र कुंडली, ग्रह स्थिति, दशा विश्लेषण, योग और दोष — सभी जानकारी विस्तार से हिंदी में। जन्म विवरण डालकर कुंडली बनाने वाला गणक अभी अंग्रेजी में है; इस पृष्ठ की सारणियाँ और व्याख्या हिंदी में हैं।
वर्ग कुंडलियाँ — वे कुंडलियाँ जो एक राशि को आगे बराबर भागों में बाँटकर बनाई जाती हैं — ऊपर की सूची में जान-बूझकर नहीं रखी गई हैं। नीचे “कुंडली के प्रकार” में उनमें से दो का परिचय है, अर्थात् वे क्या हैं और परम्परा उन्हें किस प्रश्न से जोड़ती है, किन्तु बनाकर वे यहाँ नहीं दी जातीं — इसलिए प्राप्त होने वाली वस्तुओं की सूची में उनका नाम नहीं है। उसके बदले यह पृष्ठ वह पूरा ढाँचा खोलकर रखता है जिस पर कोई भी कुंडली टिकती है: बारह भाव और उनकी स्वाभाविक राशियाँ, 12 लग्न, नौ ग्रहों का स्वामित्व और उनकी उच्च, नीच तथा मूलत्रिकोण राशियाँ, विंशोत्तरी दशा का पूरा चक्र, और 27 नक्षत्रों के स्वामी — प्रत्येक सारणी उसी सारणी से बनी जिससे इस साइट की गणना होती है, किसी हाथ से लिखी संख्या से नहीं।
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कुंडली (जन्म पत्रिका) वैदिक ज्योतिष का आधार स्तंभ है। यह जन्म के समय आकाश में ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति का एक मानचित्र है। कुंडली 12 भावों (Houses) में विभाजित होती है और प्रत्येक भाव जीवन के एक विशेष पहलू का प्रतिनिधित्व करता है। जब कोई ज्योतिषी आपकी कुंडली पढ़ता है, तो वह इन भावों में बैठे ग्रहों और उनके आपसी संबंधों के आधार पर आपके जीवन की विभिन्न घटनाओं का अनुमान लगाता है।
वैदिक ज्योतिष में कुंडली को जन्म कुंडली, जातक चक्र या होरोस्कोप भी कहा जाता है। यह प्राचीन भारतीय ऋषियों द्वारा विकसित ज्ञान प्रणाली है जो हजारों वर्षों से लोगों का मार्गदर्शन करती आ रही है। आधुनिक समय में कंप्यूटर तकनीक की सहायता से अब कुंडली बनाना बेहद आसान और सटीक हो गया है।
एक कुंडली में जो कुछ लिखा होता है, वह तीन जालियों का मेल है, और तीनों एक ही आकाश को तीन भिन्न मापों में बाँटती हैं। पहली राशिचक्र है, 12 राशियाँ, प्रत्येक 30° की। दूसरी नक्षत्रों की है, 27 भाग, प्रत्येक 13°20′ का। तीसरी भावों की है, जो आकाश की नहीं बल्कि जन्म के क्षण और जन्म के स्थान की देन है — पूर्वी क्षितिज पर उस समय जो राशि उदय हो रही थी, वही पहला भाव बनती है और शेष ग्यारह उसी क्रम में आगे गिने जाते हैं। इसी कारण जन्म का समय और स्थान माँगा जाता है: ग्रह किस राशि और किस नक्षत्र में हैं, यह पूरे भारत में एक ही रहता है, किन्तु वे किस भाव में हैं, यह थोड़े-थोड़े समय पर और हर नगर में बदल जाता है।
नीचे इस पृष्ठ पर जो सारणियाँ हैं, वे इसी ढाँचे को खोलकर रखती हैं — बारह भाव और उनकी स्वाभाविक राशियाँ, भावों के शास्त्रीय वर्ग, बारह लग्न, नौ ग्रह और उनकी उच्च-नीच राशियाँ, विंशोत्तरी दशा का पूरा चक्र, और 27 नक्षत्रों के स्वामी। इनमें कोई संख्या हाथ से नहीं लिखी गई है; हर एक उसी सारणी से निकाली गई है जिससे इस साइट के अंग्रेज़ी पृष्ठ निकाले जाते हैं, इसलिए दोनों भाषाओं के दावे एक ही स्रोत पर टिके हैं।
कुंडली के 12 भाव और उनका महत्व
लग्न भाव
व्यक्तित्व, स्वास्थ्य, शारीरिक गठन
धन भाव
धन, परिवार, वाणी, भोजन
पराक्रम भाव
साहस, भाई-बहन, छोटी यात्राएं
सुख भाव
माता, वाहन, संपत्ति, सुख
संतान भाव
संतान, शिक्षा, प्रेम, बुद्धि
रोग भाव
रोग, शत्रु, नौकरी, ऋण
दारा भाव
विवाह, साझेदारी, व्यापार
आयु भाव
आयु, रहस्य, अचानक लाभ/हानि
भाग्य भाव
भाग्य, धर्म, गुरु, विदेश यात्रा
कर्म भाव
करियर, यश, पिता, सरकार
लाभ भाव
आय, लाभ, मित्र, इच्छा पूर्ति
व्यय भाव
खर्च, मोक्ष, विदेश, हानि
कालपुरुष कुण्डली — भावों की स्वाभाविक राशि और स्वामी
ऊपर की सूची भावों के प्रचलित नाम देती है। उसके नीचे एक दूसरी सूची चलती है, जिसे कालपुरुष कुण्डली कहा जाता है: वह कुण्डली जिसमें मेष लग्न हो। यह किसी व्यक्ति की कुंडली नहीं है, राशिचक्र और भावचक्र को एक-दूसरे पर रखकर देखने का एक ढाँचा है — पहले भाव पर मेष, दूसरे पर वृषभ, और इसी क्रम में बारहवें पर मीन। इससे हर भाव को एक स्वाभाविक राशि और उस राशि का स्वामी मिल जाता है, और परम्परा भाव के स्वभाव की चर्चा प्रायः इसी जोड़ी के सहारे करती है।
नीचे की सारणी में तीन बात ध्यान देने योग्य हैं। पहली, नाम एक से अधिक हैं: चौथा भाव को सुख भाव भी कहा जाता है और बन्धु भाव भी, तथा आठवाँ भाव को आयु भाव भी कहा जाता है और रन्ध्र भाव भी। दोनों नाम शास्त्र-सम्मत हैं, इसलिए यहाँ दोनों दिए गए हैं और किसी एक को एकमात्र सही नहीं बताया गया है। दूसरी, स्वामी सदा एक ही नहीं होता: आठवाँ भाव की स्वाभाविक राशि वृश्चिक है, जिसका स्वामी मंगल है और जिसमें केतु को सह-स्वामी माना गया है। तीसरी, दो राशियों का स्वामी एक ही ग्रह हो सकता है, इसलिए बारह भावों के स्वामी बारह भिन्न ग्रह नहीं हैं — नौ ग्रहों में से कुछ दो बार आते हैं।
| भाव | शास्त्रीय नाम | विषय | स्वाभाविक राशि | स्वाभाविक स्वामी |
|---|---|---|---|---|
| 1. पहला | तनु भाव | शरीर और स्वयं | मेष | मंगल |
| 2. दूसरा | धन भाव | धन, वाणी और परिवार | वृषभ | शुक्र |
| 3. तीसरा | सहज भाव | पराक्रम, भाई-बहन और छोटी यात्राएँ | मिथुन | बुध |
| 4. चौथा | सुख भाव / बन्धु भाव | घर, माता और सुख | कर्क | चन्द्र |
| 5. पाँचवाँ | पुत्र भाव | सन्तान, विद्या और सृजन | सिंह | सूर्य |
| 6. छठा | शत्रु भाव | प्रतिस्पर्धा, ऋण और रोग | कन्या | बुध |
| 7. सातवाँ | कलत्र भाव | साझेदारी, जीवनसाथी और व्यापार | तुला | शुक्र |
| 8. आठवाँ | आयु भाव / रन्ध्र भाव | उपद्रव, गुप्त और आयु | वृश्चिक | मंगल + केतु |
| 9. नौवाँ | भाग्य भाव | भाग्य, धर्म और लम्बी यात्राएँ | धनु | गुरु |
| 10. दसवाँ | कर्म भाव | कर्म, आजीविका और प्रतिष्ठा | मकर | शनि |
| 11. ग्यारहवाँ | लाभ भाव | लाभ, आय और सम्पर्क | कुम्भ | शनि |
| 12. बारहवाँ | व्यय भाव | व्यय, त्याग और दूर देश | मीन | गुरु |
भावों का शास्त्रीय वर्गीकरण
शास्त्र बारह भावों को एक-एक करके नहीं पढ़ता, समूहों में पढ़ता है। एक ही भाव एक से अधिक समूह में हो सकता है, और यही बात कुछ भावों को दूसरों से भिन्न बनाती है। नीचे के समूह दो तरह से निकले हैं और दोनों गिनकर, किसी सूची से उतारकर नहीं: पहले तीन कोण से दूरी गिनकर, और शेष इस साइट की भाव-सारणी से — इसलिए सारणी बदले तो यह अनुच्छेद अपने आप बदल जाएगा।
सबसे अधिक ध्यान देने योग्य पंक्ति पहली है। पहला, चौथा, सातवाँ और दसवाँ भाव Kendra हैं और पहला, पाँचवाँ और नौवाँ भाव Trikona, और दोनों सूचियों में केवल एक भाव साझा है — पहला। यही कारण परम्परा में बताया जाता है कि लग्न और लग्नेश की चर्चा शेष सब से पहले होती है।
पहले तीन समूह याद रखने की चीज़ नहीं, गिनने की चीज़ हैं। कोण से गिनना शुरू कीजिए: हर तीसरा भाव कोण है, कोण के ठीक बाद वाला Panapara और कोण से ठीक पहले वाला Apoklima। इसीलिए तीनों में चार-चार भाव हैं और बारहों भाव इन तीन में बँट जाते हैं। शेष समूह इस गिनती से नहीं निकलते, वे अलग सूचियाँ हैं।
Kendra — पहला, चौथा, सातवाँ और दसवाँ भाव
कोणीय भाव — चक्र के चारों कोने, जिन पर शेष कुंडली टिकी होती है।
परम्परा इनमें बैठे ग्रह को खुलकर और बलपूर्वक फल देने वाला मानती है। परवर्ती टीकाकार इसके साथ एक चेतावनी भी जोड़ते हैं — केन्द्राधिपत्य का मत, जिसके अनुसार स्वभाव से शुभ ग्रह कोण का स्वामी बन जाने पर अपनी शुभता का कुछ अंश छोड़ देता है।
Panapara — दूसरा, पाँचवाँ, आठवाँ और ग्यारहवाँ भाव
कोणों के ठीक बाद आने वाले भाव, जो अपने पिछले कोण ने जो खोला उसे सँभालते हैं।
Apoklima — तीसरा, छठा, नौवाँ और बारहवाँ भाव
कोणों से ठीक पहले पड़ने वाले भाव, जिन्हें शास्त्र स्थिरता के नहीं, प्रयत्न और गति के भाव मानता है।
Upachaya — तीसरा, छठा, दसवाँ और ग्यारहवाँ भाव
जिनमें परम्परा के अनुसार अशुभ ग्रह भी बल पाते हैं और अपना रचनात्मक पक्ष देते हैं।
यह वर्ग भाव का वर्णन करता है, कुंडली का मूल्य नहीं।
Trikona — पहला, पाँचवाँ और नौवाँ भाव
त्रिकोण के तीन भाव, परम्परा में सबसे शुभ माने जाने वाले।
परम्परा एक से अधिक त्रिकोण गिनती है, इसलिए यह उनमें से एक है और एकमात्र नहीं। इस सारणी का त्रिकोण वह है जिसकी तीनों स्वाभाविक राशियाँ एक-दूसरे से 120° की दूरी पर पड़ती हैं।
Dusthana — छठा, आठवाँ और बारहवाँ भाव
परम्परा में जिन्हें अशुभ भाव कहा गया है। कुछ परम्पराएँ तीसरा भाव को भी इसी वर्ग में गिनती हैं, और यह मतभेद यहाँ छिपाया नहीं गया है।
यह वर्गीकरण सबसे अधिक बार निर्णय समझ लिया जाता है। यह इतना ही कहता है कि ये भाव किन विषयों के हैं। यह उस कुंडली के अच्छे या बुरे होने का कथन नहीं है, क्योंकि ये भाव किसी एक कुंडली में नहीं, हर कुंडली में होते हैं।
Maraka — दूसरा और सातवाँ भाव विवादित
जिन्हें आयु के शास्त्रीय विचार में परम्परा एक जोड़े की तरह पढ़ती है।
यह मत विवादित है और यहाँ विवादित ही रखा गया है। पराशर आयु की शास्त्रीय गणना में दूसरे और सातवें के स्वामियों को लेते हैं; परवर्ती आचार्य इस समूह को बढ़ाते हैं, किसी एक लग्न तक सीमित करते हैं, या इस सिद्धान्त को स्वीकार ही नहीं करते। दोनों पाठ यहाँ दर्ज हैं और किसी एक को चुना नहीं गया है। इस साइट का कोई पृष्ठ इससे आयु की कोई अवधि नहीं निकालता।
Moksha Trikona — बारहवाँ भाव
मोक्ष का त्रिकोण, जिसे यह वर्ग चौथे और आठवें के साथ गिनता है।
शास्त्र इस समूह के फल को बाहर से सबसे कम दिखाई देने वाला मानता है।
इनके अतिरिक्त भाव-सारणी एक टिप्पणी भी रखती है जो वर्ग नहीं है: नौवाँ भाव को शुभ भावों में सबसे बलवान माना गया है। यह परम्परा का मत है, गणना का परिणाम नहीं, इसलिए इसे अलग रखा गया है। और यही टिप्पणी एक रोचक बात भी दिखा देती है: नवाँ भाव ऊपर की गिनती में Apoklima पड़ता है, अर्थात कोण नहीं है, और फिर भी सारणी उसे शुभ भावों में सबसे बलवान कहती है। किसी भाव का बल किसी एक वर्ग से तय नहीं होता, यह उसका सीधा उदाहरण है।
दिग्बल — केवल 4 भाव, केवल 7 ग्रह
ग्रह का बल परम्परा में एक चीज़ से नहीं, कई चीज़ों से आँका जाता है, और उनमें से एक दिग्बल है — दिशा से मिलने वाला बल। इसकी सबसे उपयोगी बात यह है कि यह छोटा और बन्द नियम है: बारह भावों में से केवल 4 भाव दिग्बल देते हैं, और सब मिलाकर 7 ग्रह इसे पाते हैं। कोई ग्रह दो बार नहीं आता, कोई भाव दो बार नहीं गिना जाता, और शेष आठ भाव किसी को यह बल नहीं देते।
यह छोटा नियम प्रायः ग़लत बोला जाता है, और भूल का रूप एक ही रहता है: ग्रह जिस भाव में वास्तव में बलवान है, वह बल किसी दूसरे कारण से आता है और उसे दिग्बल कह दिया जाता है। अपनी राशि में बैठे ग्रह का बल स्वक्षेत्र का बल है और उच्च राशि का बल उच्चबल है; दोनों दिग्बल नहीं हैं। नीचे की सूची भाव-सारणी से सीधे निकली है।
पहला भाव
गुरु, बुध
चौथा भाव
चन्द्र, शुक्र
सातवाँ भाव
शनि
दसवाँ भाव
सूर्य, मंगल
बारह लग्न, उनके तत्त्व और उनके स्वामी
लग्न वही राशि है जो जन्म के समय पूर्वी क्षितिज पर उदय हो रही थी, और वही पहला भाव बन जाती है। इससे दो बातें एक साथ तय हो जाती हैं। पहली, लग्नेश कौन है — अर्थात पहले भाव की राशि का स्वामी कौन ग्रह है। दूसरी, शेष ग्यारह भावों पर कौन-कौन राशि पड़ेगी, क्योंकि राशियों का क्रम नियत है और लग्न से आगे गिनती चलती रहती है।
नीचे बारह लग्नों की सारणी है। तत्त्व और स्वभाव — अग्नि, पृथ्वी, वायु, जल तथा चर, स्थिर, द्विस्वभाव — राशि के अपने गुण हैं और लग्न बदलने पर बदल जाते हैं। अन्तिम दो स्तम्भ यह दिखाते हैं कि सातवाँ भाव लग्न से सदा सातवीं राशि पर पड़ता है और उसका स्वामी भी उसी गिनती से निकलता है — यही वह गिनती है जिसे कुंडली पढ़ने वाला हर भाव के लिए दोहराता है।
| लग्न | तत्त्व | स्वभाव | लग्नेश | वार | सातवाँ भाव |
|---|---|---|---|---|---|
| मेष Mesha | अग्नि | चर | मंगल | मंगलवार | तुला — शुक्र |
| वृषभ Vrishabha | पृथ्वी | स्थिर | शुक्र | शुक्रवार | वृश्चिक — मंगल |
| मिथुन Mithuna | वायु | द्विस्वभाव | बुध | बुधवार | धनु — गुरु |
| कर्क Karka | जल | चर | चन्द्र | सोमवार | मकर — शनि |
| सिंह Simha | अग्नि | स्थिर | सूर्य | रविवार | कुम्भ — शनि |
| कन्या Kanya | पृथ्वी | द्विस्वभाव | बुध | बुधवार | मीन — गुरु |
| तुला Tula | वायु | चर | शुक्र | शुक्रवार | मेष — मंगल |
| वृश्चिक Vrishchika | जल | स्थिर | मंगल | मंगलवार | वृषभ — शुक्र |
| धनु Dhanu | अग्नि | द्विस्वभाव | गुरु | गुरुवार | मिथुन — बुध |
| मकर Makara | पृथ्वी | चर | शनि | शनिवार | कर्क — चन्द्र |
| कुम्भ Kumbha | वायु | स्थिर | शनि | शनिवार | सिंह — सूर्य |
| मीन Meena | जल | द्विस्वभाव | गुरु | गुरुवार | कन्या — बुध |
कुंडली के प्रकार
लग्न कुंडली (Birth Chart)
जन्म के समय पूर्वी क्षितिज पर जो राशि उदय हो रही होती है, उसे लग्न कहते हैं। लग्न कुंडली सबसे महत्वपूर्ण होती है क्योंकि यह व्यक्ति के संपूर्ण जीवन का आधार है। इसमें सभी 12 भावों में ग्रहों की स्थिति दर्शाई जाती है।
चंद्र कुंडली (Moon Chart)
चंद्र कुंडली में जन्म के समय चंद्रमा जिस राशि में होता है, उसे प्रथम भाव माना जाता है। यह मन, भावनाओं और मानसिक स्थिति का विश्लेषण करने में सहायक होती है। राशिफल इसी कुंडली पर आधारित होता है।
इसी कारण वैदिक राशिफल सूर्य राशि से नहीं, चन्द्र राशि से पढ़ा जाता है। बारह राशियों का आज का पाठ आज का राशिफल पर है, और वह चन्द्र की उस दिन की राशि से चलता है।
नवमांश कुंडली (D-9 Chart)
नवमांश कुंडली विवाह, भाग्य और आध्यात्मिक उन्नति का विस्तृत विश्लेषण प्रदान करती है। यह लग्न कुंडली के बाद सबसे महत्वपूर्ण वर्ग कुंडली मानी जाती है और ग्रहों की वास्तविक शक्ति को दर्शाती है।
नाम की गणना सीधी है। एक राशि 30° की है और उसका नवाँ भाग 3°20′ का, जो ठीक एक नक्षत्र के चौथाई — एक पाद — के बराबर पड़ता है। इसलिए 12 राशियों के 108 नवांश और 27 नक्षत्रों के 108 पाद, दोनों राशिचक्र को 108 बराबर भागों में बाँटते हैं। भागों की संख्या एक होने का अर्थ यह नहीं है कि दोनों एक ही चीज़ हैं — कौन सा पाद किस नवांश राशि में जाता है, यह एक अलग मिलान है, और इन दोनों को एक मान लेना इस विषय की एक सूक्ष्म भूल है।
दशमांश कुंडली (D-10 Chart)
दशमांश कुंडली मुख्य रूप से करियर और पेशेवर जीवन का विश्लेषण करने के लिए उपयोग की जाती है। यदि आप नौकरी, व्यापार या करियर संबंधी निर्णय लेना चाहते हैं तो यह कुंडली बहुत सहायक होती है।
इसका आधार दसवाँ भाव है। इस साइट की भाव-सारणी दसवें भाव की स्वाभाविक राशि मकर और उसका स्वाभाविक स्वामी शनि देती है, उसे कर्म, आजीविका और प्रतिष्ठा का भाव कहती है, और सूर्य और मंगल को यहाँ दिग्बल देती है — कुंडली में यही वह भाव है जिससे परम्परा आजीविका और प्रतिष्ठा का प्रश्न जोड़ती है। एक बात जोड़ने योग्य है: शास्त्र आजीविका का उत्तर केवल दसवें भाव से नहीं निकालता, और इसी कारण अकेले इस भाव से कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जाता।
नौ ग्रह — स्वामित्व, उच्च, नीच और मूलत्रिकोण
वैदिक ज्योतिष नौ ग्रह गिनता है, और उनमें 2 छाया ग्रह हैं — राहु और केतु। भेद केवल नाम का नहीं है और इस साइट की राशि-सारणी में साफ़ दिखता है: 7 ग्रहों के पास अपनी राशि है, और इन 2 के पास कोई राशि नहीं है। इनकी उच्च और नीच राशि पर भी परम्पराओं में एक मत नहीं है, इसलिए नीचे की सारणी में इन दोनों की वे पंक्तियाँ ख़ाली छोड़ी गई हैं — भर देना उस मतभेद को छिपाना होता।
चार शब्द सारणी पढ़ने के लिए पर्याप्त हैं। स्वक्षेत्र वह राशि है जिसका ग्रह स्वामी है। उच्च वह राशि है जिसमें परम्परा उसे सबसे बलवान मानती है, और उसके साथ एक अंश भी दिया गया है, क्योंकि शास्त्र उच्चता को पूरी राशि नहीं, एक बिन्दु मानता है। नीच उससे ठीक सामने पड़ने वाली राशि है। मूलत्रिकोण उच्च और स्वक्षेत्र के बीच का एक अंश-खण्ड है, और वह पूरी राशि नहीं, राशि का एक हिस्सा होता है — इसीलिए उसके आगे अंशों की सीमा लिखी है।
वार का स्तम्भ भी पढ़ने योग्य है। सप्ताह के 7 दिनों के स्वामी 7 ग्रह हैं, इसलिए 2 छाया ग्रहों का अपना कोई वार नहीं है। ग्रह-सारणी इनके लिए भी एक दिन देती है, किन्तु वह उस ग्रह का वार है जिसके साथ परम्परा इनका पाठ जोड़ती है — राहु के लिए शनिवार और केतु के लिए मंगलवार — स्वामित्व नहीं।
| ग्रह | वार | महादशा | स्वक्षेत्र | उच्च | नीच | मूलत्रिकोण |
|---|---|---|---|---|---|---|
| सूर्य | रविवार | 6 वर्ष | सिंह | मेष 10° | तुला 10° | सिंह 0°–20° |
| चन्द्र | सोमवार | 10 वर्ष | कर्क | वृषभ 3° | वृश्चिक 3° | वृषभ 4°–30° |
| मंगल | मंगलवार | 7 वर्ष | मेष, वृश्चिक | मकर 28° | कर्क 28° | मेष 0°–12° |
| बुध | बुधवार | 17 वर्ष | मिथुन, कन्या | कन्या 15° | मीन 15° | कन्या 16°–20° |
| गुरु | गुरुवार | 16 वर्ष | धनु, मीन | कर्क 5° | मकर 5° | धनु 0°–10° |
| शुक्र | शुक्रवार | 20 वर्ष | वृषभ, तुला | मीन 27° | कन्या 27° | तुला 0°–15° |
| शनि | शनिवार | 19 वर्ष | मकर, कुम्भ | तुला 20° | मेष 20° | कुम्भ 0°–20° |
| राहु | 18 वर्ष | |||||
| केतु | 7 वर्ष |
दृष्टि और अस्त — ग्रह किसे देखता है, और कब मन्द पड़ता है
दृष्टि
ग्रह जिस भाव में बैठा है उसे तो प्रभावित करता ही है, किन्तु परम्परा उसे कुछ और भावों को देखने वाला भी मानती है। नियम छोटा है: शरीरधारी 7 ग्रह अपने से सातवें भाव को देखते हैं, और उनमें 3 ग्रह उसके अतिरिक्त कुछ और भावों को भी।
- मंगल — चौथा, सातवाँ, आठवाँ भाव।
- गुरु — पाँचवाँ, सातवाँ, नौवाँ भाव।
- शनि — तीसरा, सातवाँ, दसवाँ भाव।
शेष 4 ग्रह — सूर्य, चन्द्र, बुध, शुक्र — केवल सातवें को देखते हैं। राहु और केतु की दृष्टि पर परम्पराओं में मतभेद है: कुछ इन्हें गुरु की तरह देखने वाला मानते हैं और शास्त्र के कुछ पाठ इन्हें अपनी कोई दृष्टि नहीं देते। जहाँ मत एक नहीं है, वहाँ इस पृष्ठ पर संख्या नहीं दी गई है।
अस्त (Combustion)
जब कोई ग्रह सूर्य के बहुत निकट आ जाता है तो परम्परा उसे अस्त कहती है, और उसके फल को मन्द पड़ा हुआ मानती है। निकटता की सीमा हर ग्रह के लिए अलग है और अंशों में नापी जाती है, किसी घड़ी से नहीं।
- चन्द्र — 12°।
- मंगल — 17°।
- बुध — 14°, वक्री दशा में 12°।
- गुरु — 11°।
- शुक्र — 10°, वक्री दशा में 8°।
- शनि — 15°।
सबसे चौड़ी सीमा मंगल की है, 17°। सूर्य स्वयं अस्त नहीं होता, और राहु तथा केतु भी नहीं — इसीलिए ऊपर की सूची में ये तीन नाम नहीं हैं।
दशा और योग विश्लेषण
महादशा और अंतर्दशा: वैदिक ज्योतिष में विंशोत्तरी दशा पद्धति सबसे लोकप्रिय है। प्रत्येक ग्रह की एक निश्चित महादशा अवधि होती है — केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17 वर्ष। किसी भी समय कौन सी दशा चल रही है, यह कुंडली की गणना से निकलता है, और परम्परा जीवन की घटनाओं को इसी क्रम के साथ पढ़ती है।
प्रमुख योग: कुंडली में विभिन्न ग्रहों की विशेष स्थितियों से योग बनते हैं। गजकेसरी योग, बुधादित्य योग, हंस योग, मालव्य योग, रुचक योग जैसे शुभ योग व्यक्ति के जीवन में समृद्धि और सफलता लाते हैं। वहीं केमद्रुम योग, कालसर्प दोष, मांगलिक दोष जैसे अशुभ योगों का उपचार भी संभव है।
इन नामों के बारे में एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए। मांगलिक, कालसर्प और केमद्रुम — ये परम्परा के वर्गीकरण हैं, अर्थात कुंडली में एक विशेष स्थिति बनी या नहीं बनी, इसका नाम हैं। यह वर्गीकरण अपने आप कोई परिणाम नहीं बताता, और इस पृष्ठ पर किसी वर्ग के साथ न कोई घटना जोड़ी गई है, न कोई तीव्रता, न कोई अवधि। मांगलिक स्थिति की गणना ही इसका उदाहरण है: इस साइट की भाव-सारणी मंगल के लिए पाँच भाव गिनती है, कुछ परम्पराएँ एक और भाव जोड़ती हैं, और कई शास्त्रीय शर्तें इस स्थिति को निरस्त भी मानती हैं — इसलिए एक ही कुंडली पर दो जानकार अलग निष्कर्ष तक पहुँच सकते हैं। जहाँ नियम ही एक नहीं है, वहाँ परिणाम बताना गणना नहीं होता।
विंशोत्तरी दशा — पूरा चक्र, क्रम में
विंशोत्तरी का अर्थ ही 120 है, और यही इस पद्धति की पूरी लम्बाई है। नौ ग्रहों की महादशाएँ एक नियत क्रम में चलती हैं और उनकी अवधियाँ जोड़ने पर 120 वर्ष बनते हैं। नीचे की सारणी में अन्तिम स्तम्भ यही जोड़ चलता हुआ दिखाता है, इसलिए चक्र का बन्द होना पढ़ा जा सकता है, मान लेना नहीं पड़ता।
क्रम मनमाना नहीं है। यह ठीक वही क्रम है जिसमें नक्षत्रों के स्वामी आते हैं: 27 नक्षत्रों पर नौ स्वामी तीन बार चक्कर लगाते हैं, प्रत्येक के हिस्से 3 नक्षत्र, और पहले नौ नक्षत्रों के स्वामी ही महादशाओं का क्रम बना देते हैं। इसीलिए जन्म के समय चन्द्र जिस नक्षत्र में था, उसका स्वामी पहली महादशा तय करता है — और उस नक्षत्र में चन्द्र कितना आगे बढ़ चुका था, उससे यह तय होता है कि उस पहली महादशा का कितना भाग जन्म से पहले ही बीत चुका है।
सारणी दो और बातें बताती है जो प्रायः उलटी बोली जाती हैं। सबसे लम्बी महादशा शुक्र की है, 20 वर्ष, और सबसे छोटी सूर्य की, 6 वर्ष। हर महादशा आगे नौ अन्तर्दशाओं में बँटती है, उन्हीं नौ ग्रहों की, उसी क्रम में और उसी अनुपात में — इसलिए अन्तर्दशा की लम्बाई महादशा की लम्बाई से निकलती है, अलग से याद रखने की कोई सूची नहीं है।
| क्रम | महादशा | अवधि | चलता जोड़ | इसके नक्षत्र |
|---|---|---|---|---|
| 1 | केतु | 7 वर्ष | 7 वर्ष | अश्विनी, मघा, मूल |
| 2 | शुक्र | 20 वर्ष | 27 वर्ष | भरणी, पूर्व फाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा |
| 3 | सूर्य | 6 वर्ष | 33 वर्ष | कृत्तिका, उत्तर फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा |
| 4 | चन्द्र | 10 वर्ष | 43 वर्ष | रोहिणी, हस्त, श्रवण |
| 5 | मंगल | 7 वर्ष | 50 वर्ष | मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा |
| 6 | राहु | 18 वर्ष | 68 वर्ष | आर्द्रा, स्वाती, शतभिषा |
| 7 | गुरु | 16 वर्ष | 84 वर्ष | पुनर्वसु, विशाखा, पूर्व भाद्रपद |
| 8 | शनि | 19 वर्ष | 103 वर्ष | पुष्य, अनुराधा, उत्तर भाद्रपद |
| 9 | बुध | 17 वर्ष | 120 वर्ष | आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती |
| कुल | 120 वर्ष | 27 नक्षत्र |
जन्म नक्षत्र, राशि की सन्धि और गण्डमूल
कुंडली में राशि और नक्षत्र दो अलग बँटवारे हैं, और वे आपस में नहीं बैठते। एक राशि 30° की है और एक नक्षत्र 13°20′ का, इसलिए 27 में से 9 नक्षत्र राशि की सीमा पर बँटे हुए हैं — उनका एक हिस्सा एक राशि में पड़ता है और दूसरा अगली में। इसका व्यावहारिक परिणाम यह है कि केवल नक्षत्र जान लेने से राशि तय नहीं होती, और इसीलिए कुंडली की गणना नक्षत्र का नाम नहीं, चन्द्र का निरयन भोगांश लेती है।
जन्म नक्षत्र दो जगह काम आता है। पहला, विंशोत्तरी दशा का आरम्भ उसी के स्वामी से होता है, जैसा ऊपर की सारणी में दिखाया गया है। दूसरा, वैदिक मुहूर्त का तारा बल नक्षत्रों से गिना जाता है, राशियों से नहीं — और यही 27 नक्षत्र पंचांग के पाँच अंगों में से एक हैं, जहाँ हर दिन का नक्षत्र गणना करके दिया गया है।
गण्डमूल परम्परा का एक वर्गीकरण है, और उसकी गणना पूरी तरह खुली है। 6 नक्षत्र इसमें आते हैं, और वे ठीक वे हैं जिनके स्वामी केतु और बुध हैं। इनकी विशेषता यह है कि हर एक राशि की सन्धि पर पड़ता है: केतु वाले तीन किसी राशि के आरम्भ से लगते हैं और बुध वाले तीन किसी राशि के अन्त पर समाप्त होते हैं। इसी सन्धि से नाम आया है। परम्परा में इनके लिए शान्ति का विधान बताया गया है; उस विधान का कोई परिणाम, कोई अवधि या कोई तीव्रता इस पृष्ठ पर नहीं दी गई है, क्योंकि वह वर्गीकरण से निकलती नहीं है।
अश्विनी
स्वामी केतु · मेष के आरम्भ पर
आश्लेषा
स्वामी बुध · कर्क के अन्त पर
मघा
स्वामी केतु · सिंह के आरम्भ पर
ज्येष्ठा
स्वामी बुध · वृश्चिक के अन्त पर
मूल
स्वामी केतु · धनु के आरम्भ पर
रेवती
स्वामी बुध · मीन के अन्त पर
कुंडली क्या तय करती है और क्या नहीं
कुंडली स्थितियों का एक नक़्शा है। वह यह बताती है कि जन्म के क्षण पर कौन सा ग्रह किस राशि, किस भाव और किस नक्षत्र में था, कौन सी राशि उदय हो रही थी, और उस क्षण से गिनने पर कौन सी दशा कब आएगी। इतना गणना है और जाँचा जा सकता है — इस साइट का कोई पृष्ठ इससे आगे जाकर यह नहीं कहता कि आपके साथ क्या होगा।
इसके आगे जो है, वह पाठ है। शास्त्र किस भाव से किस विषय को जोड़ता है, किस ग्रह को किस राशि में बलवान मानता है, किस स्थिति को कौन सा नाम देता है — यह सब एक दीर्घ परम्परा का कथन है, और इस पृष्ठ पर वह उसी रूप में रखा गया है। ऊपर की सारणियों में जहाँ भी परम्परा का मत है, वह कहा गया है कि परम्परा का मत है; जहाँ परम्पराओं में एक मत नहीं है, वहाँ मतभेद लिखा गया है और कोई एक उत्तर नहीं चुना गया।
एक भेद और है जिसे न रखना इस विषय की सबसे आम भूल है। किसी वर्गीकरण का नाम उसका परिणाम नहीं होता। किसी कुंडली में कोई स्थिति बनी है या नहीं बनी — यह गिनने की बात है और गिनी जा सकती है। उस स्थिति से जीवन में क्या होगा, कितना होगा और कब होगा — यह गिनने की बात नहीं है, और इसे प्रतिशत में बदल देना गणना नहीं, प्रस्तुति होती। इसीलिए इस पृष्ठ पर किसी दोष या योग के आगे कोई प्रतिशत, कोई तीव्रता और कोई समय-सीमा नहीं दी गई है।
उपायों के बारे में भी यही नियम लागू है। परम्परा में रत्न, मन्त्र, दान और व्रत का विधान है, और वह विधान शास्त्रों में उपलब्ध है। किन्तु कौन सा उपाय किसके लिए ठीक है, यह पूरी कुंडली देखे बिना तय नहीं होता — एक ही रत्न एक लग्न के लिए हितकर और दूसरे के लिए उलटा बताया जाता है, क्योंकि वह ग्रह दो लग्नों में दो भिन्न भावों का स्वामी होता है। इस पृष्ठ पर इसीलिए कोई रत्न, कोई भार और कोई अवधि नहीं लिखी गई है, और किसी उपाय को किसी रोग का इलाज नहीं बताया गया है।
सामान्य प्रश्न
कुंडली बनाने के लिए क्या जानकारी चाहिए?+
कुंडली बनाने के लिए आपकी सही जन्म तिथि, जन्म का सटीक समय और जन्म स्थान की जानकारी आवश्यक है। जितनी सही जानकारी होगी, कुंडली उतनी ही सटीक बनेगी।
क्या ऑनलाइन कुंडली सटीक होती है?+
गणना का हिस्सा सटीक है और जाँचा जा सकता है। ग्रहों की स्थिति निरयन राशिचक्र पर, लाहिड़ी अयनांश से निकाली जाती है — यही पद्धति इस साइट के पंचांग और राशिफल के पृष्ठ भी मानते हैं, इसलिए तीनों जगह की संख्याएँ एक ही आधार पर टिकी हैं। सटीकता की सीमा गणना नहीं, आपकी दी हुई जानकारी तय करती है। ग्रह किस राशि और किस नक्षत्र में हैं, यह जन्म की तिथि से निकल आता है; किन्तु वे किस भाव में हैं, यह जन्म के समय और स्थान से तय होता है, क्योंकि लग्न पूर्वी क्षितिज पर उदय होती राशि है और वह थोड़े-थोड़े समय पर तथा हर नगर में बदलती है। इसीलिए जन्म का सही समय माँगा जाता है, और अनुमान से भरा गया समय भावों की पूरी सारणी बदल देता है।
कुंडली में कितने भाव होते हैं?+
कुंडली में कुल 12 भाव (Houses) होते हैं। प्रत्येक भाव जीवन के अलग-अलग पहलू को दर्शाता है — जैसे प्रथम भाव व्यक्तित्व, सप्तम भाव विवाह और दशम भाव करियर से संबंधित है।
एक ही भाव के नाम अलग-अलग जगह अलग क्यों मिलते हैं?+
क्योंकि एक ही भाव के एक से अधिक नाम शास्त्र-सम्मत हैं, और कोई एक सूची दूसरी को ग़लत नहीं ठहराती। चौथा भाव सुख भाव और बन्धु भाव, दोनों कहा जाता है; आठवाँ भाव आयु भाव और रन्ध्र भाव, दोनों कहा जाता है। इस पृष्ठ पर तीनों परम्पराएँ साथ रखी गई हैं — प्रचलित नाम, शास्त्रीय नाम और पंचांग की सूची का नाम — किसी एक को एकमात्र सही बताए बिना।
विंशोत्तरी दशा के नौ ग्रहों की कुल अवधि कितनी है?+
120 वर्ष। नौ महादशाओं का क्रम और उनकी अवधि है — केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चन्द्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17 वर्ष — और इन्हें जोड़ने पर 120 आता है। सबसे लम्बी शुक्र की 20 वर्ष की है और सबसे छोटी सूर्य की 6 वर्ष की। यह चक्र किस ग्रह से आरम्भ होगा, यह जन्म के समय चन्द्र जिस नक्षत्र में था उसके स्वामी से तय होता है, इसलिए एक ही तिथि पर जन्मे दो लोगों की पहली महादशा अलग हो सकती है।
दिग्बल क्या है?+
दिशा से मिलने वाला बल। बारह भावों में से केवल 4 भाव यह बल देते हैं, और 7 ग्रह इसे पाते हैं — पहला भाव में गुरु और बुध, चौथा भाव में चन्द्र और शुक्र, सातवाँ भाव में शनि, दसवाँ भाव में सूर्य और मंगल। कोई ग्रह दो बार नहीं आता और कोई भाव दो बार नहीं गिना जाता, इसलिए शेष आठ भाव किसी को दिग्बल नहीं देते। स्वक्षेत्र या उच्च राशि से मिलने वाला बल इससे भिन्न है और उसे दिग्बल कहना एक प्रचलित भूल है।
गण्डमूल नक्षत्र कौन से हैं?+
6 नक्षत्र — अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल, रेवती। ये ठीक वही नक्षत्र हैं जिनके स्वामी केतु और बुध हैं, और हर एक राशि की सन्धि पर पड़ता है — तीन किसी राशि के आरम्भ पर और तीन किसी राशि के अन्त पर। यह परम्परा का एक वर्गीकरण है; इस पृष्ठ पर इसका कोई परिणाम नहीं बताया गया है।
क्या कुंडली से यह पता चल जाता है कि आगे क्या होगा?+
इस पृष्ठ पर ऐसा कोई दावा नहीं है। यहाँ जो कुछ है वह दो हिस्सों में बाँटा जा सकता है — एक, गणना: जन्म के समय ग्रह किस राशि, किस भाव और किस नक्षत्र में थे, और कौन सी दशा कब चलेगी। दूसरा, परम्परा का पाठ: किस भाव या ग्रह से शास्त्र किस विषय को जोड़ता है। पहला हिस्सा जाँचा जा सकता है, दूसरा एक दीर्घ परम्परा का कथन है, और किसी घटना की भविष्यवाणी इन दोनों में से कोई नहीं है। जहाँ गणना रुक जाती है, यह पृष्ठ वहीं रुकता है।
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