पाँच अंग, सात अवधियाँ
पंचांग
यह खंड 1 जनवरी 2026 से 31 दिसम्बर 2027 तक के हर दिन का पंचांग रखता है — 730 दिन, और हर दिन का अपना पृष्ठ। प्रत्येक पृष्ठ पर पाँचों अंग — तिथि, नक्षत्र, योग, करण और वार — तथा सातों अवधियाँ हैं: ब्रह्म मुहूर्त, सूर्योदय, यमघण्ट काल, गुलिक काल, अभिजित मुहूर्त, राहु काल और सूर्यास्त। ये संख्याएँ नई दिल्ली के लिए JPL DE421 इफ़ेमेरिस से लाहिड़ी अयनांश के साथ निकाली गई हैं।
इस पृष्ठ पर आज की तिथि नहीं लिखी है, और यह जान-बूझकर है: पृष्ठ एक बार बनता है और कई दिन बाद तक वही परोसा जाता रहता है, इसलिए वह यह दावा नहीं कर सकता कि आज कौन सा दिन है। नीचे 24 महीने हैं, और वही इस खंड में जाने का रास्ता है।
महीने के अनुसार देखें
हर महीने के पृष्ठ पर उसके सभी दिन एक तालिका में हैं — तिथि, पक्ष, नक्षत्र, योग, करण और राहु काल — और वहाँ से किसी भी एक दिन का पूरा पृष्ठ खुलता है। दोनों वर्ष पूरे हैं, एक भी दिन छूटा नहीं है।
2026
पंचांग के पाँच अंग
पंचांग शब्द का अर्थ ही पाँच अंग है, इसलिए नाम अपनी परिभाषा साथ लेकर चलता है। इनमें चार सूर्य और चन्द्र की स्थिति से बनते हैं और दिन भर बदलते रहते हैं; पाँचवाँ वार है, जो सप्ताह का दिन है और सूची में किसी प्रतीक के कारण नहीं, एक व्यावहारिक कारण से आता है। यह विवरण एक बार पढ़ लेने योग्य है, क्योंकि इस खंड का हर दिनांक वाला पृष्ठ इसे मान लेकर सीधे अपनी संख्याओं पर आ जाता है — वहाँ परिभाषा एक-एक पंक्ति की है। यही विवरण 730 पृष्ठों पर दुहराना उन्हें एक-दूसरे की नक़ल बना देता, इसलिए पूरा विवरण यहाँ एक ही जगह रखा गया है।
तिथि
चन्द्र दिवस, और पंचांग में तारीख़ पूछने पर आशय प्रायः इसी से होता है। यह सूर्य और चन्द्र के बीच के कोणीय अन्तर से बनती है: हर 12° के अन्तर पर एक तिथि, इसलिए एक चन्द्र मास में 30 तिथियाँ — 15 शुक्ल पक्ष की, जब चन्द्र बढ़ता है, और 15 कृष्ण पक्ष की, जब वह घटता है। पूर्णिमा और अमावस्या दोनों पक्षों की सीमा पर पड़ती हैं, किसी एक के भीतर नहीं, इसलिए इन दो नामों के आगे पक्ष नहीं लगाया जाता। चन्द्र की गति एक-सी नहीं रहती, इसलिए तिथि की लम्बाई भी नियत नहीं है — वह लगभग 19 से 26 घण्टे तक जाती है। यही कारण है कि तिथि सौर दिन के साथ नहीं बैठती और हर पंचांग को एक नियम चुनना पड़ता है। यहाँ का नियम सूर्योदय है: जो तिथि सूर्योदय के समय चल रही हो, वही उस दिन के नाम पर लिखी जाती है।
नक्षत्र
चन्द्र का घर। निरयन राशिचक्र 27 भागों में बाँटा गया है, हर भाग 13°20′ का और हर भाग का अपना नाम — अश्विनी से रेवती तक। जिस भाग में चन्द्र हो, उस समय का नक्षत्र वही है। पाँचों अंगों में यह सबसे प्राचीन है, और वैदिक मुहूर्त का बड़ा हिस्सा इसी पर टिका हुआ है: तारा बल नक्षत्रों से गिना जाता है, राशियों से नहीं। हर नक्षत्र आगे चार पदों में बँटा है, प्रत्येक 3°20′ का, और नामकरण की परम्परा तथा सूक्ष्म कुंडली-गणना इन्हीं पदों से चलती है।
योग
सूर्य और चन्द्र के भोगांशों का जोड़, 27 भागों में बाँटा हुआ, प्रत्येक 13°20′ का। आसन और प्राणायाम वाले योग से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है — एक ही शब्द दो भिन्न चीज़ों के लिए चलता आया है। यह तिथि की तुलना में अधिक समान गति से आगे बढ़ता है, क्योंकि इसमें दोनों ज्योतियों की गति जुड़ जाती है, एक की दूसरे से दूरी नहीं। 27 में से कुछ — व्याघात, परिघ और वैधृति — परम्परा में किसी काम के आरम्भ के लिए नहीं चुने जाते।
करण
आधी तिथि, अर्थात् 6° का अन्तर। एक चन्द्र मास में 60 करण बीतते हैं, किन्तु नाम केवल 11 हैं: सात चर करण, जो आठ-आठ बार दुहराते हैं, और चार स्थिर करण, जो अमावस्या के आस-पास एक-एक बार आते हैं — किंस्तुघ्न, शकुनि, चतुष्पद और नाग। इसलिए 11 और 60, दोनों संख्याएँ सही हैं: एक नामों की गिनती है और दूसरी एक मास में पड़ने वाली आवृत्तियों की। विष्टि, जिसे भद्रा भी कहा जाता है, वह करण है जिसे परम्परा छोड़ती है।
वार
सप्ताह का दिन, और पाँचों में एकमात्र अंग जो किसी ग्रह की आकाशीय स्थिति नहीं है। हर वार का एक स्वामी है — रविवार का सूर्य, सोमवार का चन्द्र, मंगलवार का मंगल, बुधवार का बुध, गुरुवार का गुरु, शुक्रवार का शुक्र और शनिवार का शनि। यह सूची में एक व्यावहारिक कारण से है: राहु काल दिन के किस हिस्से में पड़ेगा, यह वार से तय होता है। सूर्योदय से सूर्यास्त तक के समय को आठ बराबर भागों में बाँटा जाता है, और उनमें से कौन सा भाग छोड़ा जाएगा, यह वार बताता है। परिणाम यह है कि भारत में सबसे अधिक मानी जाने वाली त्याज्य अवधि घड़ी के किसी नियत समय पर नहीं, वार और उस दिन के दिनमान पर टिकी है — इसलिए वह वर्ष भर सरकती रहती है और हर नगर में अलग पड़ती है।
पंचांग क्या तय करता है और क्या नहीं
पंचांग स्थितियों की तालिका है। यह बताता है कि सूर्य और चन्द्र कहाँ हैं, और दीर्घ परम्परा के अनुसार दिन के कौन से हिस्से किसी काम के आरम्भ के लिए छोड़ दिए जाते हैं। यह नहीं बताता कि आपका दिन कैसा बीतेगा, और इस खंड का कोई पृष्ठ ऐसा दावा नहीं करता।
कारण विनय नहीं, अंकगणित है। किसी राशि से गिने गए बारह भावों में छह शुभ माने जाते हैं, इसलिए किसी भी दिन लगभग आधी राशियाँ अनुकूल स्थिति में होती हैं। नौ तारा में तीन त्याज्य हैं, इसलिए किसी भी दिन लगभग एक-तिहाई जन्म-नक्षत्र छँट जाते हैं। दोनों छाननी एक साथ लगाने पर किसी एक व्यक्ति के लिए लगभग एक-तिहाई दिन बचते हैं — यह जानने योग्य बात है और प्रतिशत में बदलने योग्य बात नहीं। इसे “आज का दिन 82% शुभ” बना देना गणना नहीं, प्रस्तुति होती।
वास्तविक मुहूर्त इससे आगे छाँटता है: तिथि, करण, योग, और अन्त में जातक की अपनी कुंडली तथा चल रही दशा। किसी तारीख़ से बँधा पृष्ठ इन अन्तिम दोनों को नहीं जानता। वह ईमानदारी से इतना कर सकता है कि स्थितियाँ सामने रख दे, दोनों शास्त्रीय छाननियाँ दिखा दे, और यह स्पष्ट कह दे कि गणना कहाँ रुक जाती है।
एक भेद प्रायः छूट जाता है, और वह इस खंड को समझने के लिए आवश्यक है। तिथि, नक्षत्र, योग और करण पूरे भारत में एक ही रहते हैं, क्योंकि वे दो पिंडों के बीच के अन्तर से बनते हैं और अन्तर देखने वाले के स्थान से नहीं बदलता। सूर्योदय, सूर्यास्त और उनसे निकलने वाली सातों अवधियाँ स्थान से बदलती हैं। इसीलिए यहाँ का हर आँकड़ा नई दिल्ली (28.6139°N, 77.209°E) के लिए है, और एक निश्चित स्थान के लिए बनी सारणी का अर्थ यही है।
दिनांक वाले पृष्ठ नक्षत्र के साथ अंश क्यों देते हैं
छपा हुआ पंचांग बता देता है कि चन्द्र किस नक्षत्र में है और वहीं रुक जाता है। तारा बल के लिए इतना पर्याप्त है, क्योंकि वह नक्षत्रों से गिना जाता है — किन्तु चन्द्र बल के लिए नहीं, क्योंकि वह राशियों से गिना जाता है। एक नक्षत्र 13°20′ का है और एक राशि 30° की, इसलिए दोनों जालियाँ आपस में नहीं बैठतीं: 27 में से नौ नक्षत्र राशि की सीमा पर बँटे हुए हैं, और लगभग एक-तिहाई दिनों पर केवल नक्षत्र जान लेने से राशि तय नहीं होती। इसलिए इस खंड का हर दिनांक वाला पृष्ठ चन्द्र की राशि उसके निरयन भोगांश से निकालता है और अंश भी छापता है, नक्षत्र से उसका अनुमान नहीं लगाता।
अंश राशि के साथ पढ़ने योग्य है। चन्द्र एक राशि सवा दो दिन में पार कर लेता है, इसलिए जो दिन 26° पर आरम्भ होता है वह उसी राशि में समाप्त नहीं होगा। सारणी चन्द्र को दिन में एक बार, सूर्योदय पर देखती है, इसलिए हर पृष्ठ यह बताता है कि संक्रमण किन दो सूर्योदयों के बीच पड़ता है। किसी मिनट का नाम वह नहीं लेता, क्योंकि दिन में एक बार देखी गई सारणी उतनी सूक्ष्मता सँभाल नहीं सकती, और सँभाल न सकने वाली सूक्ष्मता छाप देना गढ़ना है।
इसका एक परिणाम पूरी सारणी जोड़ने पर दिखता है। किसी भी दिन ठीक एक राशि चन्द्राष्टम में होती है, किन्तु इन 730 दिनों में हर राशि की बारी बराबर 61 बार नहीं आती — किसी की 55 और किसी की 68 सूर्योदयों तक। यह गणना की भूल नहीं है। चन्द्र पृथ्वी के निकट होने पर तेज़ और दूर होने पर धीमा चलता है, इसलिए जिस राशि में उस समय उसका अपभू पड़ता है, उसमें वह अधिक ठहरता है — और अपभू स्वयं 8.85 वर्षों में राशिचक्र का एक चक्कर लगाता है, जो इस सारणी से लम्बा समय है। इसीलिए ये दोनों संख्याएँ यहाँ किसी दूसरे पृष्ठ से उतारी नहीं गई हैं, सारणी गिनकर निकाली गई हैं।
प्रश्न
सामान्य प्रश्न
पंचांग क्या है?+
पंच और अंग — पाँच अंग। यह एक दैनिक सारणी है जो पाँच मात्राएँ देती है: तिथि, चन्द्र जिस नक्षत्र में हो वह, योग, करण और वार। इनमें चार सूर्य और चन्द्र की स्थिति हैं और दिन भर लगातार बदलते रहते हैं; पाँचवाँ सप्ताह का दिन है, जो नहीं बदलता। परम्परागत मुहूर्त इन्हीं पाँचों में से छाना जाता है, और इसीलिए पंचांग शुभ-अशुभ का निर्णय नहीं, उस निर्णय की सामग्री है।
एक ही दिन का पंचांग दो जगह अलग-अलग क्यों दिखता है?+
तीन कारण, और तीनों वैध हैं। पहला स्थान: सूर्योदय, सूर्यास्त और उनसे निकलने वाली सारी अवधियाँ अक्षांश और देशान्तर पर निर्भर हैं, इसलिए नई दिल्ली की सारणी चेन्नई की सारणी नहीं है। दूसरा अयनांश — सायन और निरयन राशिचक्र के बीच का अन्तर — जिसमें लाहिड़ी, रमण और कृष्णमूर्ति इतना अन्तर रखते हैं कि नक्षत्र की सीमा सरक जाती है। तीसरा नियम: तिथि किसी भी घड़ी में आरम्भ हो सकती है, इसलिए जो पंचांग सूर्योदय की तिथि लिखता है और जो दिन के अधिकांश भाग की तिथि लिखता है, वे कभी-कभी एक तिथि के अन्तर से अलग पड़ेंगे।
राहु काल क्या है और उसकी गणना कैसे होती है?+
सूर्योदय से सूर्यास्त तक के समय का आठवाँ हिस्सा, जिसे परम्परा में कोई महत्त्वपूर्ण काम आरम्भ करने के लिए नहीं चुना जाता। आठ भागों में से कौन सा भाग, यह वार से तय होता है। यह घड़ी का कोई नियत समय नहीं, उस दिन के अपने दिनमान का एक अंश है — इसलिए यह वर्ष भर सरकता रहता है और नगर बदलने पर बदल जाता है। जो स्रोत पूरे भारत के लिए एक ही राहु काल छापता है, वह गणना नहीं कर रहा।
इस खंड की गणना किस स्रोत से हुई है?+
JPL DE421 इफ़ेमेरिस से, निरयन स्थितियाँ लाहिड़ी अयनांश के साथ, और सब कुछ नई दिल्ली के लिए। सारणी 1 जनवरी 2026 से 31 दिसम्बर 2027 तक के 730 दिन ढकती है, और पाँचों अंग सूर्योदय के समय पढ़े गए हैं। तिथि, नक्षत्र, योग और करण पूरे भारत में एक ही रहते हैं, क्योंकि वे सूर्य और चन्द्र के अन्तर से बनते हैं; सूर्योदय, सूर्यास्त और सातों अवधियाँ देशान्तर के साथ कुछ मिनटों से लेकर लगभग एक घण्टे तक सरकती हैं। इन पृष्ठों की संख्याएँ किसी छपे पंचांग से उतारी नहीं गई हैं।
इस पृष्ठ पर आज की तिथि क्यों नहीं लिखी है?+
क्योंकि यह पृष्ठ एक बार बनकर रख दिया जाता है और आप उसे उसके बनने के कई दिन बाद पढ़ रहे हो सकते हैं। ऐसा पृष्ठ यह नहीं जान सकता कि आज कौन सा दिन है, और जो जाना नहीं जा सकता उसे लिखना अनुमान है, गणना नहीं। इसीलिए यहाँ महीनों की सूची है और हर दिन का अपना पृष्ठ है, जिस पर उसकी अपनी तारीख़ लिखी है। आज का पंचांग आज का राशिफल वाले पृष्ठ पर है, जो उसे आपके ब्राउज़र में उसी सारणी से निकालता है।
इसी के साथ पढ़ें
आज की तिथि और राहु काल जानने के लिए नीचे पहली कड़ी ठीक है, जो उन्हें आपके ब्राउज़र में इसी सारणी से निकालती है — इसीलिए वह बता सकती है कि आज क्या चल रहा है और यह पृष्ठ नहीं बता सकता। अपनी चन्द्र राशि और नक्षत्र एक बार जान लेने के लिए दूसरी कड़ी है, और उसके बाद इस खंड का हर दिनांक वाला पृष्ठ अधिक काम का हो जाता है।