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इसके साथ हिंदी में 771 पृष्ठों का एक संदर्भ खंड भी है, जिसमें 755 पृष्ठ अकेले पंचांग के हैं। नीचे इस पूरे खंड का नक़्शा है — बारह राशियाँ, नौ ग्रह, 27 नक्षत्र और कुंडली के बारह भाव, हर एक की तालिका उसी सारणी से बनी जिससे उन पृष्ठों की गणना होती है।
हमारी प्रमुख सेवाएं
आज का राशिफल
सभी 12 राशियों का आज का पंचांग और आज का चन्द्र बल — मेष से मीन तक, और हर राशि का अपना पृष्ठ। उस पृष्ठ पर आज की तिथि, नक्षत्र, योग और करण, उस राशि से गिना गया चन्द्र का भाव, उसके सारे चन्द्राष्टम दिन तिथि सहित, राशि के नक्षत्र और पद, तारा बल का चक्र, और राशि स्वामी की वर्तमान स्थिति मिलेगी। यहाँ जो कुछ है वह गणना से निकला है, इसीलिए आज का फल क्या होगा यह इन पृष्ठों पर नहीं लिखा है — वह राशि से नहीं निकलता, जन्म कुंडली, दशा और गोचर तीनों को देखकर निकलता है।
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पंचांग
1 जनवरी 2026 से 31 दिसम्बर 2027 तक हर दिन का पंचांग — 730 दिन, हर दिन का अपना पृष्ठ, और 24 महीनों की तालिकाएँ। पाँचों अंग, दिन के सातों काल और बारहों राशियों का चन्द्र बल एक ही जगह।
हस्तरेखा ज्ञान
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पंचांग — इस खंड का सबसे बड़ा हिस्सा
हिंदी के 771 पृष्ठों में से 755 पंचांग के हैं। 1 जनवरी 2026 से 31 दिसम्बर 2027 तक के प्रत्येक दिन का अपना पृष्ठ है — कुल 730 दिन — और उनके ऊपर हर महीने का एक पृष्ठ, जो उस महीने की सारी पंक्तियाँ एक तालिका में रख देता है। महीने 24 हैं और दोनों वर्ष पूरे हैं, बीच में एक भी दिन छूटा नहीं। पूरे खंड की संख्याएँ नई दिल्ली के लिए निकाली गई हैं और JPL DE421 इफ़ेमेरिस से आती हैं, किसी छपे पंचांग से उतारी नहीं गई हैं।
पंचांग शब्द का अर्थ ही पाँच अंग है, इसलिए नाम अपनी परिभाषा साथ लेकर चलता है। नीचे की तालिका बताती है कि हर अंग के कितने नाम होते हैं, क्योंकि यही संख्या तय करती है कि वह अंग कितनी जल्दी अपने को दुहराता है। पूरी परिभाषाएँ इस पृष्ठ पर नहीं दुहराई गई हैं — वे पंचांग हब पर एक ही जगह रखी गई हैं, और कारण साफ़ है: वही विवरण 730 पृष्ठों पर दुहराने से वे पृष्ठ एक-दूसरे की नक़ल बन जाते।
| अंग | कितने नाम | क्या तय करता है |
|---|---|---|
| तिथि | 30 | पूरे चान्द्र मास के 30 नाम, हर पक्ष में 15। यही अंग दिन की किसी भी घड़ी बदल सकता है, इसलिए पंचांग उसे सूर्योदय के समय पढ़ता है। |
| नक्षत्र | 27 | राशिचक्र के 27 बराबर भाग, जिनसे चन्द्र क्रम से गुज़रता है। किस भाग में है, यह हर दिन के पृष्ठ पर लिखा रहता है। |
| योग | 27 | 27 नाम — गिनती में नक्षत्रों के बराबर, पर बनने का तरीक़ा दूसरा है। |
| करण | 60 | 60 नाम, क्योंकि हर तिथि के 2 होते हैं — यही इस सूची का सबसे तेज़ चलने वाला अंग बना देता है। |
| वार | 7 | सप्ताह के 7 दिन। पाँचों में यही एक अंग है जो दिन भर नहीं बदलता, और इसीलिए सूची में इसकी जगह किसी प्रतीक के कारण नहीं, एक व्यावहारिक कारण से है। |
| पक्ष | 2 | शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष — चन्द्र मास के दो आधे हिस्से, और तिथि का नाम इसी के साथ पढ़ा जाता है। |
एक दिन के पृष्ठ पर क्या होता है
- ◆सूर्योदय के समय चल रहे पाँचों अंग, एक तालिका में — इसलिए कि तिथि किसी भी घड़ी बदल सकती है और एक तारीख़ के सामने एक ही नाम लिखना हो तो वह सूर्योदय का नाम होता है।
- ◆दिन के सातों काल — ब्रह्म मुहूर्त, सूर्योदय, यमघण्ट काल, गुलिक काल, अभिजित मुहूर्त, राहु काल और सूर्यास्त — नाम, आरम्भ, अन्त और अवधि के साथ।
- ◆सूर्योदय से सूर्यास्त तक के आठ बराबर भाग, और वह अंकगणित खुला हुआ जिससे तय होता है कि उन आठ में से किन तीन को नाम मिलेगा।
- ◆चन्द्र बल — बारहों राशियों के लिए उस दिन का भाव, एक ही तालिका में। एक ही आकाश, और बारह अलग उत्तर।
- ◆तारा बल — 27 जन्म-नक्षत्रों के लिए, 9 तारा के चक्र से, जिसमें हर तारा ठीक 3 नक्षत्रों के पास पड़ता है।
महीने के पृष्ठ पर वही दिन एक साथ आ जाते हैं। उसकी तालिका में दिनांक, तिथि, नक्षत्र, सूर्योदय और राहु काल के स्तम्भ हैं, और चन्द्राष्टम का एक स्तम्भ भी — यानी जो पंक्तियाँ अलग-अलग पृष्ठों पर बिखरी हैं वे एक महीने की एक नज़र में आ जाती हैं। किसी भी पंक्ति से उस दिन का पूरा पृष्ठ खुल जाता है, और महीनों की यही सूची इस पूरे खंड में जाने का रास्ता है।
इस पृष्ठ पर किसी काल का समय नहीं लिखा है, और यह जान-बूझकर है। सूर्योदय, सूर्यास्त और उनसे निकलने वाली सातों अवधियाँ अक्षांश और देशान्तर से बदलती हैं और हर दिन सरकती भी हैं, इसलिए एक बार बनकर हफ़्तों परोसे जाने वाले पृष्ठ पर छपा कोई समय जल्दी ही ग़लत हो जाएगा। वह संख्या उसी दिन के पृष्ठ पर है जिसकी वह है। तिथि, नक्षत्र, योग और करण इस मामले में अलग हैं — वे सूर्य और चन्द्र के बीच के अन्तर से बनते हैं, और अन्तर देखने वाले के नगर से नहीं बदलता।
पंचांग खंड खोलें — 24 महीने →बारह राशियाँ — स्वामी, तत्त्व और निरयन अवधि
राशिचक्र 12 बराबर भागों में बँटा है और हर भाग 30° का है। नीचे हर राशि का देवनागरी नाम, उसका रोमन रूप, स्वामी ग्रह, तत्त्व और स्वभाव है, और हर नाम से उस राशि का पृष्ठ खुलता है। तालिका हाथ से नहीं लिखी गई — यह उसी सारणी से बनी है जिससे राशिफल के बारह पृष्ठ बनते हैं, इसलिए दोनों जगह एक ही बात लिखी मिलेगी।
बँटवारे में दो चीज़ें बिलकुल बराबर हैं। 4 तत्त्वों — अग्नि, पृथ्वी, वायु और जल — में हर तत्त्व की 3 राशियाँ हैं, और स्वभाव के 3 वर्गों — चर, स्थिर और द्विस्वभाव — में हर वर्ग की 4। स्वामित्व बराबर नहीं है: सूर्य और चन्द्र एक-एक राशि के स्वामी हैं और बाक़ी 5 ग्रह दो-दो के, इसलिए 5 × 2 और 2 × 1 मिलाकर 12 बनते हैं। राहु और केतु किसी राशि के स्वामी नहीं हैं, इसीलिए इस स्तम्भ में सात नाम ही घूमते हैं।
| राशि | रोमन रूप | स्वामी | तत्त्व | स्वभाव | निरयन अवधि |
|---|---|---|---|---|---|
| मेष | Mesha | मंगल | अग्नि | चर | Apr 14 – May 14 |
| वृषभ | Vrishabha | शुक्र | पृथ्वी | स्थिर | May 15 – Jun 14 |
| मिथुन | Mithuna | बुध | वायु | द्विस्वभाव | Jun 15 – Jul 16 |
| कर्क | Karka | चन्द्र | जल | चर | Jul 17 – Aug 16 |
| सिंह | Simha | सूर्य | अग्नि | स्थिर | Aug 17 – Sep 16 |
| कन्या | Kanya | बुध | पृथ्वी | द्विस्वभाव | Sep 17 – Oct 17 |
| तुला | Tula | शुक्र | वायु | चर | Oct 18 – Nov 16 |
| वृश्चिक | Vrishchika | मंगल | जल | स्थिर | Nov 17 – Dec 15 |
| धनु | Dhanu | गुरु | अग्नि | द्विस्वभाव | Dec 16 – Jan 14 |
| मकर | Makara | शनि | पृथ्वी | चर | Jan 15 – Feb 12 |
| कुम्भ | Kumbha | शनि | वायु | स्थिर | Feb 13 – Mar 14 |
| मीन | Meena | गुरु | जल | द्विस्वभाव | Mar 15 – Apr 13 |
अन्तिम स्तम्भ की अवधि निरयन है, सायन नहीं, और यही अन्तर है जिसके कारण कहीं और पढ़ी हुई राशि इस साइट की राशि से एक क़दम आगे-पीछे बैठ सकती है। वैदिक ज्योतिष निरयन राशिचक्र पर चलता है, इसलिए यहाँ के सारे पृष्ठ वही अवधि मानते हैं।
हर राशि के पृष्ठ पर उस राशि से गिना गया चन्द्र बल है — बारहों राशियों के लिए, एक ही तालिका में — और 1 जनवरी 2026 से 31 दिसम्बर 2027 तक उस राशि के सारे चन्द्राष्टम दिन। साथ में तारा बल का वह हिस्सा भी है जो जन्म-नक्षत्र जाने बिना जहाँ तक जा सकता है, और वहाँ यह साफ़ लिखा है कि गणना किस जगह रुक जाती है।
नौ ग्रह — स्वामित्व, नक्षत्र और विंशोत्तरी वर्ष
ज्योतिष की गिनती में ग्रह 9 हैं। इनमें सात राशियों के स्वामी हैं और दो छाया ग्रह — राहु और केतु — किसी राशि के स्वामी नहीं हैं। नीचे की तालिका हर ग्रह के आगे तीन बातें रखती है: वह किन राशियों का स्वामी है, कितने नक्षत्रों का, और विंशोत्तरी दशा में उसके कितने वर्ष हैं।
नक्षत्रों का बँटवारा बिलकुल बराबर है — नौ में से हर ग्रह के पास ठीक 3 नक्षत्र, इसलिए 9 × 3 = 27। वर्षों का बँटवारा बराबर नहीं है: सूर्य के 6 वर्ष सबसे कम हैं और शुक्र के 20 सबसे अधिक, और नौ मिलाकर 120 वर्ष का एक चक्र बनता है। किसी जातक की गिनती किस ग्रह से आरम्भ होगी, यह जन्म के समय चन्द्र जिस नक्षत्र में था उससे तय होता है — इसीलिए नक्षत्र का स्वामी और दशा का क्रम एक ही तालिका के दो स्तम्भ हैं।
| ग्रह | किन राशियों का स्वामी | नक्षत्र | विंशोत्तरी वर्ष |
|---|---|---|---|
| सूर्य | सिंह | 3 | 6 |
| चन्द्र | कर्क | 3 | 10 |
| मंगल | मेष और वृश्चिक | 3 | 7 |
| बुध | मिथुन और कन्या | 3 | 17 |
| गुरु | धनु और मीन | 3 | 16 |
| शुक्र | वृषभ और तुला | 3 | 20 |
| शनि | मकर और कुम्भ | 3 | 19 |
| राहु | किसी राशि का नहीं | 3 | 18 |
| केतु | किसी राशि का नहीं | 3 | 7 |
| कुल | 12 राशियाँ | 27 | 120 |
सात वार और उनके स्वामी
सप्ताह के 7 दिनों का एक-एक स्वामी है, और वे सातों उसी सूची से आते हैं जिससे राशियों के स्वामी आते हैं। राहु और केतु इसमें भी नहीं आते। वार पंचांग का वही अंग है जो दिन भर नहीं बदलता, और उसका स्वामी ही तय करता है कि सूर्योदय से सूर्यास्त तक के आठ भागों में से किन तीन को नाम मिलेगा — इसीलिए एक ही अवधि सोमवार को एक जगह पड़ती है और मंगलवार को दूसरी।
| वार | वार का स्वामी |
|---|---|
| रविवार | सूर्य |
| सोमवार | चन्द्र |
| मंगलवार | मंगल |
| बुधवार | बुध |
| गुरुवार | गुरु |
| शुक्रवार | शुक्र |
| शनिवार | शनि |
27 नक्षत्र और दशा का क्रम
नक्षत्र राशि से छोटी इकाई है। राशिचक्र के 360° को 27 में बाँटने पर एक नक्षत्र 13°20′ का बनता है, जबकि एक राशि 30° की है — और यही दोनों जालियों को आपस में बैठने से रोकता है। 27 में से 9 नक्षत्र किसी राशि की सीमा पर बँटे हुए हैं, यानी उनका एक हिस्सा एक राशि में और दूसरा अगली में पड़ता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि केवल नक्षत्र जान लेने से राशि तय नहीं होती, और इसीलिए पंचांग के दिनांक वाले पृष्ठ चन्द्र की राशि उसके अंश से निकालते हैं, नक्षत्र से उसका अनुमान नहीं लगाते।
नीचे 27 नक्षत्र राशिचक्र के क्रम में हैं, हर एक के साथ उसका स्वामी और विंशोत्तरी दशा में उस स्वामी के वर्ष। स्वामियों का क्रम अपने आप को ठीक 3 बार दुहराता है — केतु, शुक्र, सूर्य, चन्द्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि और बुध — और यही क्रम विंशोत्तरी दशा का क्रम भी है। इसका एक परिणाम गिनने योग्य है: जिस ग्रह के वर्ष सबसे अधिक हैं, उसके तीनों नक्षत्रों में जन्म लेने वाले सबसे लम्बी पहली दशा में आते हैं।
अश्विनी
स्वामी केतु · 7 वर्ष
भरणी
स्वामी शुक्र · 20 वर्ष
कृत्तिका
स्वामी सूर्य · 6 वर्ष
रोहिणी
स्वामी चन्द्र · 10 वर्ष
मृगशिरा
स्वामी मंगल · 7 वर्ष
आर्द्रा
स्वामी राहु · 18 वर्ष
पुनर्वसु
स्वामी गुरु · 16 वर्ष
पुष्य
स्वामी शनि · 19 वर्ष
आश्लेषा
स्वामी बुध · 17 वर्ष
मघा
स्वामी केतु · 7 वर्ष
पूर्व फाल्गुनी
स्वामी शुक्र · 20 वर्ष
उत्तर फाल्गुनी
स्वामी सूर्य · 6 वर्ष
हस्त
स्वामी चन्द्र · 10 वर्ष
चित्रा
स्वामी मंगल · 7 वर्ष
स्वाती
स्वामी राहु · 18 वर्ष
विशाखा
स्वामी गुरु · 16 वर्ष
अनुराधा
स्वामी शनि · 19 वर्ष
ज्येष्ठा
स्वामी बुध · 17 वर्ष
मूल
स्वामी केतु · 7 वर्ष
पूर्वाषाढ़ा
स्वामी शुक्र · 20 वर्ष
उत्तराषाढ़ा
स्वामी सूर्य · 6 वर्ष
श्रवण
स्वामी चन्द्र · 10 वर्ष
धनिष्ठा
स्वामी मंगल · 7 वर्ष
शतभिषा
स्वामी राहु · 18 वर्ष
पूर्व भाद्रपद
स्वामी गुरु · 16 वर्ष
उत्तर भाद्रपद
स्वामी शनि · 19 वर्ष
रेवती
स्वामी बुध · 17 वर्ष
अपना जन्म-नक्षत्र एक बार जान लेने पर पंचांग के पृष्ठ अधिक काम के हो जाते हैं, क्योंकि तारा बल जन्म-नक्षत्र से नक्षत्र गिनता है और चन्द्र बल जन्म राशि से राशियाँ — दोनों अलग-अलग चीज़ नापते हैं और दोनों का हिसाब हर दिनांक वाले पृष्ठ पर खुला हुआ है। नक्षत्र 27 हैं और तारा 9, इसलिए वह चक्र भी ठीक 3 बार दुहराता है।
कुंडली के बारह भाव
जन्मकुंडली 12 भावों में बँटती है और हर भाव के हिस्से कुछ निश्चित विषय आते हैं। नाम पारम्परिक हैं और सारे एक साथ नीचे दिए गए हैं, ताकि किसी पृष्ठ पर भाव की संख्या पढ़कर यह ढूँढ़ना न पड़े कि वह किस विषय का है।
गिनती का तरीक़ा जान लेना इस तालिका से भी काम का है। कोई भाव अपने आप में कुछ नहीं होता — वह इस बात से पढ़ा जाता है कि किसी की जन्म राशि से गिनने पर कोई ग्रह या कोई राशि कहाँ पड़ती है। इसीलिए एक ही दिन बारह लोगों के लिए बारह अलग भाव होता है, और पंचांग के हर दिनांक वाले पृष्ठ की चन्द्र बल तालिका ठीक यही बारह पंक्तियाँ छापती है।
| क्रम | पारम्परिक नाम | किन विषयों का |
|---|---|---|
| पहला | तनु | शरीर और स्वयं |
| दूसरा | धन | धन, वाणी और परिवार |
| तीसरा | सहज | पराक्रम, भाई-बहन और छोटी यात्राएँ |
| चौथा | बन्धु | घर, माता और सुख |
| पाँचवाँ | पुत्र | सन्तान, विद्या और सृजन |
| छठा | शत्रु | प्रतिस्पर्धा, ऋण और रोग |
| सातवाँ | कलत्र | साझेदारी, जीवनसाथी और व्यापार |
| आठवाँ | रन्ध्र | उपद्रव, गुप्त और आयु |
| नौवाँ | भाग्य | भाग्य, धर्म और लम्बी यात्राएँ |
| दसवाँ | कर्म | कर्म, आजीविका और प्रतिष्ठा |
| ग्यारहवाँ | लाभ | लाभ, आय और सम्पर्क |
| बारहवाँ | व्यय | व्यय, त्याग और दूर देश |
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इस हिंदी खंड में क्या-क्या है
हिंदी में इस समय 771 पृष्ठ हैं और नीचे उनका पूरा हिसाब है। यह जोड़ हाथ से नहीं लिखा गया — हर पंक्ति का आँकड़ा उसी सूची से आता है जिससे वे पृष्ठ बनते हैं, इसलिए किसी खंड में एक पृष्ठ जुड़ने पर यह जोड़ अपने आप बदल जाएगा।
राशिफल
13 पृष्ठ
एक हब और बारह राशियों के पृष्ठ। हर राशि के पृष्ठ पर उस राशि से गिना गया चन्द्र बल और उसके सारे चन्द्राष्टम दिन हैं।
पंचांग
755 पृष्ठ
एक हब, 24 महीने और 730 दिन — इस खंड का सबसे बड़ा हिस्सा, और यही अकेला हिस्सा तारीख़ से बँधा है।
कुंडली
1 पृष्ठ
जन्म तिथि, समय और स्थान से कुंडली बनाने का पृष्ठ, ग्रह स्थिति और दशा के विवरण के साथ।
हस्तरेखा
1 पृष्ठ
हाथ की रेखाओं का विवरण — जीवन, मस्तिष्क, हृदय और भाग्य रेखा।
इनके ऊपर यही एक पृष्ठ है, जिस पर आप हैं, और वह किसी तारीख़ से बँधा नहीं है। तारीख़ से बँधी हर बात पंचांग के अपने पृष्ठों पर है, जहाँ हर पृष्ठ पर उसकी अपनी तारीख़ लिखी होती है।
सामान्य प्रश्न
इस हिंदी खंड में कुल कितने पृष्ठ हैं?+
771, और उनमें से 755 अकेले पंचांग के हैं — एक हब, 24 महीनों के पृष्ठ और 730 दिनों के पृष्ठ। बाक़ी में राशिफल का हब और बारह राशियों के पृष्ठ हैं, कुंडली और हस्तरेखा के एक-एक पृष्ठ, और यह हब। ये संख्याएँ इस पृष्ठ पर लिखी नहीं गई हैं, गिनी गई हैं: वही सारणियाँ जिनसे वे पृष्ठ बनते हैं, इस वाक्य को भी भरती हैं।
पंचांग के पाँच अंग कौन से हैं?+
तिथि, नक्षत्र, योग, करण और वार। इनके साथ पक्ष भी हर पृष्ठ पर रहता है, क्योंकि तिथि का नाम उसके बिना अधूरा है। नामों की गिनती बराबर नहीं है — 30 तिथि, 27 नक्षत्र, 27 योग, 60 करण और 7 वार — और इसी से तय होता है कि कोई अंग कितनी जल्दी अपने को दुहराता है। पूरी परिभाषाएँ पंचांग हब पर एक ही जगह हैं।
राशि और नक्षत्र में क्या अन्तर है?+
दोनों एक ही राशिचक्र की दो जालियाँ हैं, पर बराबर की नहीं। राशियाँ 12 हैं और हर एक 30° की; नक्षत्र 27 हैं और हर एक 13°20′ का। इसलिए दोनों की सीमाएँ आपस में नहीं बैठतीं: 27 में से 9 नक्षत्र किसी राशि की सीमा पर बँटे हुए हैं, यानी उनका एक हिस्सा एक राशि में और दूसरा अगली में पड़ता है। इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि केवल नक्षत्र जान लेने से राशि तय नहीं होती, और इसीलिए पंचांग के पृष्ठ चन्द्र की राशि उसके अंश से निकालते हैं।
विंशोत्तरी दशा के वर्ष कैसे बनते हैं?+
नौ ग्रहों के अपने-अपने वर्ष जोड़ने पर 120 वर्ष का एक चक्र बनता है। सबसे छोटा भाग सूर्य का है, 6 वर्ष, और सबसे बड़ा शुक्र का, 20 वर्ष। किस ग्रह से किसी जातक की गिनती आरम्भ होगी, यह जन्म के समय चन्द्र जिस नक्षत्र में था उससे तय होता है — इसीलिए नक्षत्र का स्वामी और दशा का क्रम एक ही तालिका के दो स्तम्भ हैं। नक्षत्रों का बँटवारा बराबर है, हर ग्रह के पास ठीक 3।
इस पृष्ठ पर किसी काल का समय क्यों नहीं लिखा है?+
क्योंकि वह किसी एक दिन और किसी एक नगर का होता है, और यह पृष्ठ दोनों नहीं जानता। सूर्योदय, सूर्यास्त और उनसे निकलने वाली सातों अवधियाँ अक्षांश और देशान्तर से बदलती हैं और हर दिन सरकती भी हैं, इसलिए एक स्थिर पृष्ठ पर छपा कोई समय कुछ ही दिनों में ग़लत हो जाएगा। वह संख्या उसी दिन के पृष्ठ पर है जिसकी वह है। तिथि, नक्षत्र, योग और करण इस मामले में अलग हैं — वे सूर्य और चन्द्र के बीच के अन्तर से बनते हैं, और अन्तर देखने वाले के नगर से नहीं बदलता।
राशिफल सूर्य राशि से पढ़ा जाता है या चन्द्र राशि से?+
वैदिक परम्परा में राशि का अर्थ चन्द्र राशि है, सूर्य राशि नहीं — जन्म-नक्षत्र भी चन्द्र का ही नक्षत्र है और विंशोत्तरी दशा की गिनती भी उसी से आरम्भ होती है। इसी कारण इस खंड के राशिफल पृष्ठ चन्द्र की स्थिति से बने हैं और हर दिनांक वाले पृष्ठ पर बारहों राशियों की एक ही तालिका मिलती है। अपनी चन्द्र राशि और नक्षत्र एक बार जान लेने पर ये पृष्ठ अधिक काम के हो जाते हैं।
इस पृष्ठ की तालिकाएँ कहाँ से आती हैं
ऊपर की हर तालिका किसी एक सारणी से बनी है, हाथ से लिखी नहीं गई। बारह राशियों के स्वामी, तत्त्व, स्वभाव और निरयन अवधि राशियों की सारणी से आते हैं; नौ ग्रहों के वर्ष और नक्षत्र ग्रहों तथा नक्षत्रों की सारणियों से; पंचांग के अंगों की गिनती उन्हीं नामों की सूचियों से जिनसे पंचांग के 730 पृष्ठ बनते हैं। इसका एक व्यावहारिक अर्थ है: किसी सारणी में एक पंक्ति बदलने पर यह पृष्ठ अपने आप बदल जाएगा, और जिस नाम का देवनागरी रूप कहीं नहीं मिलेगा उस पर यह पृष्ठ बनना ही बन्द कर देगा — चुपचाप कुछ ग़लत छापने के बजाय।
जो इस पृष्ठ पर नहीं है, वह भी जान-बूझकर नहीं है। किसी काल का समय नहीं, कोई तारीख़ नहीं, कोई प्रतिशत नहीं, और आपके दिन के बारे में इस पृष्ठ की अपनी कोई भविष्यवाणी नहीं। एक स्थिर पृष्ठ यह नहीं जान सकता कि आप उसे किस दिन और किस नगर में पढ़ रहे हैं, और जो जाना नहीं जा सकता उसे छाप देना गणना नहीं, अनुमान है। जो गिना जा सकता है वह ऊपर की तालिकाओं में है, और जो किसी एक दिन का है वह उस दिन के अपने पृष्ठ पर।
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